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गंगा की मिट्टी से भी अब कमाई, बिक रही 50 रुपये किलो

गीला बालू-मिट्टी 40 रुपये किलो तथा गंगा के बाहर का सूखा बालू 25 रुपये किलो बिक रहा

by City Headline
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  • मिथिला, मगध एवं नेपाल आदि के निवासी घर में पिंडी बनाने सहित अन्‍य धार्मिक आयोजनों में कर रहे हैं बेगूसराय के सिम‍रिया घाट से निकाली गई बालू-मिट्टी

बेगूसराय। सनातन संस्कृति और प्राचीन ग्रंथों में जीवनदायिनी कही जाने वाली मां गंगा, सिर्फ जीवनदायिनी, पापनाशनी और मोक्षदायिनी ही नहीं बल्कि रोजगार दायिनी भी है। उत्तर में हिमालय से दक्षिण में गंगा सागर तक गंगा के बेसिन में बसे करोड़ों लोग किसी ना किसी रूप में गंगा से फायदा ले रहे हैं।
भारतीय डाक विभाग गंगाजल की बड़े पैमाने पर बिक्री कर रहा है। गंगोत्री से लेकर गंगासागर तक हजारों-हजार लोग बोतल एवं डब्बा में भरकर गंगाजल बेच रहे हैं लेकिन अब गंगा की मिट्टी भी सोना उगल रही है। सोना मतलब लोगों के आर्थिक समृद्धि का श्रोत बन रही है। बेगूसराय में गंगा से निकाली गयी मिट्टी (स्थानीय भाषा में गंगौट) 50 रुपये किलो बिक रही है।
गंगा के अंदर से निकाला गया गीला बालू-मिट्टी 40 रुपये किलो तथा गंगा के बाहर का सूखा बालू 25 रुपये किलो बिक रहा है। हालांकि यह खुदरा भाव है, थोक में लेने पर कुछ छूट भी दिया जाता है। बिहार के गंगा घाटों में से प्रमुख सिमरिया में बड़े पैमाने पर गंगा के बालू और मिट्टी की बिक्री हो रही है। यहां करीब एक सौ परिवार इस धंधा में लगे हुए हैं। परिवार के पुरुष सदस्य गंगा से गीली मिट्टी निकालते हैं। उसके बाद अन्य सदस्य करीब पांच-पांच सौ ग्राम का गोला बनाकर सुखाते हैं और सुखाने के बाद बेचा जाता है।
सिमरिया में स्नान करने के लिए आने वाले मिथिला, मगध एवं नेपाल के लोगों और समय-समय पर छोटे जहाज से आने वाले विदेशी पर्यटक भी इस मिट्टी को अपने घर ले जाते हैं। घर में स्थापित होने वाले देवी का पिंडी इसी मिट्टी से बनता है। गंगा के क्षेत्र से अत्यधिक दूरी में रहने वाले श्रद्धालु गंगा के मिट्टी को अपने घर में रखकर पूजा करते हैं।
पहले लोग खुद से स्नान करने के बाद गंगा से मिट्टी निकालते थे, लेकिन अब उनकी जीवन शैली बदल रही है। सिमरिया आने वाले लोग गंगा से मिट्टी निकालने में खुद का परिश्रम करने के बदले स्थानीय लोगों द्वारा निकाल कर रखे गए सूखी मिट्टी ही खरीद कर ले जाते हैं। वहीं, कुछ लोग घर में भूजा भूंजने तथा अन्य देव कर्मों के लिए गंगा का बालू खरीद कर ले जा रहे हैं। बालू बेचने वाले स्थानीय लोग एक किलो एवं दो किलो बालू पॉलिथीन में पैक कर बेच रहे हैं।
गुरुवार को गंगा घाट पर गंगा की मिट्टी बेच रहे सीता देवी, विमल देवी, विनय कुमार आदि ने बताया कि पानी के अंदर से मिट्टी निकालने में काफी परेशानी होती है। हम लोग मां गंगा के पुराने सेवक हैं, लोगों की मांग को देखते हुए मिट्टी निकालकर बेचते हैं। माता गंगा करोड़ों लोगों को रोजी रोजगार दिए हुए हैं, हम भी कोई गलत काम नहीं कर रहे हैं। अपने जीविकोपार्जन तथा श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए यह धंधा कर रहे हैं।
गंगा के अर्थशास्त्र से जुड़े अनि‍ल कहते हैं कि गंगा में पाई जाने वाली तीन सौ से अधिक प्रजाति की मछली से करोड़ों लोगों का जीवन यापन होता है। 20 करोड़ से अधिक लोग पीने और सिंचाई के पानी के लिए पूरी तरह से गंगा और सहायक नदियों पर निर्भर हैं। गंगा एक ओर अपनी सहायक नदियों के साथ देश के बड़े भू-भाग के लिए सिंचाई का बारहमासी स्रोत है। तो वहीं, गंगा किनारे बसे तमाम शहर और मठ-मंदिर भारतीय अर्थव्यवस्था के बड़े स्रोत हैं। अब तो गंगा की मिट्टी भी गंगा की गोद में बसे लोगों के लिए आर्थिक समृद्धि का स्रोत बन रही है।

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