शायरी और दर्शन: जीवन के मायने तलाशने का अनवरत सफर

जीवन के चौराहे और फैसलों की घड़ी

जिंदगी की फितरत ही इम्तहान लेना है। जीवन के हर पड़ाव पर, हर मोड़ पर हमें एक से अधिक रास्ते दिखाई देते हैं। यह वह समय होता है जब मंजिल की चाहत में सही रास्ते का चुनाव करना सबसे बड़ी चुनौती बन जाता है। ऐसे ही निर्णायक क्षणों में व्यक्ति की नैतिकता, उसका साहस और खुद पर विश्वास ही उसका असली संबल बनकर उभरते हैं। साहित्य और शायरी सदियों से इंसान को इन द्वंद्वों से निकलने की राह दिखाते आए हैं। शेरो-शायरी की दुनिया में ऐसे कई नगीने हैं जो न केवल हकीकत से रूबरू करवाते हैं, बल्कि जीवन को देखने का एक नया नजरिया भी पेश करते हैं।

शायरी का आईना: दर्द और जमीर

जीवन में मिलने वाले जख्मों और दुनिया के व्यवहार पर वामिक जौनपुरी का यह शेर एक अलग ही हौसला देता है, जहाँ वे चोट खाकर भी मुस्कुराने की बात करते हैं: जहां चोट खाना, वहीं मुस्कुराना मगर इस अदा से कि रो दे ज़माना

वहीं, ऐजाज़ रहमानी इंसान की क्षमता और उसके व्यवहार के विरोधाभास को बरसात के तालाब और समुद्र के उदाहरण से समझाते हैं। जीवन में जमीर (अंतरात्मा) की भूमिका पर क़मर इकबाल का यह शेर आज के दौर में बेहद प्रासंगिक है, जो बताता है कि दुनिया की सारी दौलत भी खोए हुए जमीर को वापस नहीं ला सकती: इक चीज़ थी ज़मीर जो वापस न ला सका लौटा तो है ज़रूर वो दुनिया ख़रीदकर

नश्वरता और अस्तित्व का प्रश्न

बशीर बद्र और वसीम बरेलवी जैसे शायरों ने इस बात पर जोर दिया है कि दुनिया किसी के आने या जाने से नहीं रुकती, मगर रोशनी और उम्मीद हमेशा कायम रहती है। ये दुनिया है यहां कोई जगह ख़ाली नहीं रहती किसी के आने-जाने से कभी कुछ कम नहीं होता

जीवन की नश्वरता और अंतिम सत्य को बेदिल और सलीम शाहिद ने बड़ी संजीदगी से बयां किया है। सलीम शाहिद आगाह करते हैं कि मिट्टी का जिस्म लेकर चलने वालों को यह याद रखना चाहिए कि रास्ते में कठिनाइयों का समंदर भी आएगा। वहीं, चकबस्त और फिराक गोरखपुरी जैसे दिग्गज शायर पाप-पुण्य और इश्क की आध्यात्मिक व्याख्या करते हुए नजर आते हैं। फिराक गोरखपुरी साफ कहते हैं: कोई समझे तो एक बात कहूं इश्क़ तौफ़ीक़ है, गुनाह नहीं

सात समंदर पार: आधुनिक जीवन में अर्थ की तलाश

जहाँ एक तरफ उर्दू शायरी जीवन के फलसफे को लफ्जों में पिरोती है, वहीं दूसरी ओर सात समंदर पार पश्चिमी दुनिया में भी इसी ‘तत्व’ की खोज जारी है। कैलिफोर्निया की भागती-दौड़ती जिंदगी के बीच, एक आधुनिक कविता ‘होल्डिंग माय ब्रेथ’ (Holding My Breath) इसी कशमकश को बयां करती है।

इस वाकये में, एक योगा क्लास के दौरान जब ‘इमैनेंस’ (Immanence – यानी सर्वव्यापकता या हर कण में ईश्वर का वास) जैसा भारी-भरकम शब्द बिना कहे ही वातावरण में तैर गया, तो लेखिका का मन जिज्ञासा से भर उठा। दक्षिणी कैलिफोर्निया की सुबह आमतौर पर शोरगुल वाली होती है, लेकिन उस दिन कुदरत भी संदिग्ध रूप से शांत थी। इसी शांति में लेखिका ने जब इस शब्द का अर्थ खोजने के लिए गूगल के ‘लघु देवताओं’ (Small gods of search) का सहारा लिया, तो वह दर्शनशास्त्र की भूलभुलैया में जा फंसीं।

दार्शनिक उधेड़बुन और कॉफी की प्याली

इंटरनेट ने उन्हें डेल्यूज़ और हीगल जैसे दार्शनिकों के जटिल विचारों के सामने ला खड़ा किया। खोज स्पिनोज़ा तक भी पहुंची, जिनसे लेखिका का पुराना ‘बौद्धिक परिचय’ था। वहां से यह सफर एक युवा रब्बी के लेखों और यहूदी धर्मशास्त्र की ओर मुड़ गया, जहाँ ‘त्ज़िमत्ज़ुम’ (Tzimtzum – दैवीय संकुचन) जैसी गूढ़ अवधारणाएं सामने आईं। लेखिका, जो खुद को चीजों को जोड़ने वाला (Suturer) मानती हैं, इस तमाम दार्शनिक उधेड़बुन के बीच एक बेहद मानवीय अनुभव की तलाश में थीं।

आत्मा का जुड़ाव

अंततः, यह सारी खोज कोस्टा मेसा के ‘मूनगोट’ (MoonGoat) कैफे में आकर थमी। यह एक ऐसी जगह है जहाँ अब मुफ्त वाई-फाई नहीं मिलता, और शायद यह एक अच्छी बात है। क्योंकि वाई-फाई न होने की वजह से आपको अपने साथ या तो कोई किताब लानी पड़ती है या फिर कोई दोस्त। लेखिका मानती हैं कि ये दोनों ही चीजें आत्मा के लिए बेहतर हैं।

असल में, चाहे वह योग क्लास में महसूस हुई शांति हो, गूगल पर की गई दार्शनिक खोज हो, या फिर कॉफी की मेज पर दोस्त के साथ बैठकर की गई गुफ्तगू—यह सब उसी ‘सर्वव्यापकता’ या ‘इमैनेंस’ की ओर इशारा करते हैं। जीवन का असली मर्म किताबों और इंटरनेट के जटिल शब्दों में नहीं, बल्कि मानवीय जुड़ाव और उस रूहानी सुकून में है जो हम दूसरों के साथ साझा करते हैं। यही वह जगह है जहाँ शायरी की रूहानियत और आधुनिक जीवन का दर्शन एक ही बिंदु पर आकर मिल जाते हैं।