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Uttarakhand: पुरोला रेंज में 220 साल पुराने चीड़ के पेड़ की समाधी, मिली थी ‘महावृक्ष’ की उपाधि; दीदार के लिए पहुंच रहे पर्यटक

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उत्तराखंड (Uttarakhand) में 220 साल का चीड़ का पेड़ समाधी अवस्था में भी पर्यटकों को खूब लुभा रहा है. दूर-दूर से पर्यटक इसे देखने के लिए पहुंचते हैं. देवभूमि उत्तराखंड अपने प्राकृतिक सौंदर्य, ग्लेशियरों, नदियों, झीलों, तालों, बुग्यालों के लिए फेमस है. यहां पर एशिया का सबसे लंबा वृक्ष (Chid Tree) मौजूद है. उत्तरकाशी जिले के पुरोला वन रेंज में चीड़ का महावृक्ष समाधी अवस्था में मौजूद हैं. ये पेड़ पर्यटकों के लिए आज भी आकर्षण का केंद्र बना हुआ है. उत्तरकाशी (Uttarkashi) जिले से 160 किमी दूर पुरोला विकासखंड में पुरोला त्यूणी मोटर मार्ग पर देवता वन रेंज में टौंस नदी के प्रवाह क्षेत्र में चीड़ का 220 साल से भी पुराना पेक्ष था, यह पेड़ एशिया महाद्वीप का सबसे लंबा पेड़ कहलाता था.

चीड़ के पेड़ की लंबाई 60.65 मीटर से ज्यादा और चौड़ाई 2.70 मीटर तक थी. साल 1997 में भारत सरकार के वन और पर्यावरण विकास मंत्रालय को पुरोला के देवता रेंज के चीड़ के बारे में जानकारी मिली. इसके बाद चीड़ के इस पुराने पेड़ को मंत्रालय द्वारा “महावृक्ष” की उपाधि से नवाजा गया. इस पेड़ के बारे में एक कहावत बहुत प्रचिलित है. कहा जाता है कि साल 1964-65 में रूपिन सुपिन वन क्षेत्र के तहत वन गुर्जरों का एक दल यहां डेरा डालने आया था, उसी समय तत्कालीन वन प्रभारी भी क्षेत्र के दौरे पर थे. जब वह वन गुर्जरों से मुखातिब हुए. इस दौरान वन प्रभारी ने गुर्जरों से यह कहते हुए शर्त रखी कि अगर उनमें से कोई भी इस वृक्ष पर चढ़ जाएगा तो यह वन भूमि उन सभी को लीज पर दे दी जाएगी.

गैनोडर्मा एप्लेनेटम कवक से पीड़त महावृक्ष

गुर्जरों में एक साहसी महिला वन प्रभारी की उस चुनौती को स्वीकार करते हुए महावृक्ष पर चढ़ गई. कहा जाता है कि वह साहसी गुर्जर महिला महावृक्ष पर चढ़ तो गई लेकिन नीचे उतरते समय उसका पैर फिसल गया. चोट लगने की वजह से उसकी मृत्यु हो गई, जिसके बाद वन भूमि को लीज पर नहीं दिया गया.

इस महावृक्ष से संबंधित कई और किवदंतियां भी हैं. कहा जाता है कि 220 साल से ज्यादा उम्र का यह चीड़ का महावृक्ष गैनोडर्मा एप्लेनेटम कवक नाम के रोग से ग्रस्त हो गया था. धीरे धीरे यह पेड़ अंदर ही अंदर खोखला होता चला गया.

2007 में जमीदोंज हो गया चीड़ का पेड़

इस पेड़ को रोग से बचाने की कवायद शुरू हुई. साल 2007 में भारतीय वन अनुसंधान संस्थान देहरादून के पैथोलॉजी विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ ए एन शुक्ला के नेतृत्व में एक विशेषज्ञ टीम ने चीड़ के महावृक्ष का ट्रीटमेंट किया था. पेड़ में कंक्रीट भरकर इलाज की कोशिश की गई, लेकिन ये कोशिश ज्यादा समय तक सफल सिद्ध नहीं हो सकी. 8 मई 2007 को आए एक भीषण तूफान में एशिया महाद्वीप का चीड़ का यह सबसे लंबा महावृक्ष अपनी आयु पूरी करके जमींदोज हो गया.चीड़ के इस महावृक्ष को काटकर वन विभाग ने पुरोला के कार्यालय में पर्यटकों के लिए संरक्षित कर के रखा है. पर्यटक जब यमुना और टौंस घाटी की यात्रा पर पहुंचते हैं तो एशिया के महावृक्ष का का दीदार जरूर करते हैं.

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