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यूक्रेन युद्ध एक बार फिर गुटनिरपेक्षवाद को जिंदा कर सकता है, जिसमें कई देशों का गठबंधन मौजूद होगा

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के वी सुरेश :- कोरोना महामारी (Corona Pandemic) के वार के दौर से गुजर रही दुनिया को यूक्रेन युद्ध (Ukraine War) ने पूरी तरह से बदल कर रख दिया है. यूक्रेन संघर्ष ने दुनिया को साफ तौर पर तीन अलग-अलग गुटों में विभाजित कर दिया है पश्चिमी गठबंधन – जिसमें अमेरिका, कनाडा और यूरोप शामिल हैं. रूस और चीन (Russia And China) सहित उसके सहयोगी- भारत, दक्षिण अमेरिकी देश ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका, इंडोनेशिया, वियतनाम, कजाकिस्तान और दूसरे विकासशील देश. पश्चिमी देश रूस को दंडित करने पर जोर दे रहे हैं और मांग कर रहे हैं कि बाकी दुनिया भी इसकी निंदा में शामिल हों, लेकिन चीन, बेलारूस और आर्मेनिया रूस के साथ मजबूती के साथ खड़े हैं. भारत ने कहा है कि वह शत्रुता को तुरंत दूर कर शांति बहाल कर बातचीत के जरिए संकट को हल करने के पक्ष में है.

संयुक्त राष्ट्र आम सभा और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में वोटिंग ने राष्ट्रों के गठबंधन के बीच दरार को बिल्कुल उजागर कर दिया है. भले ही भारत और चीन एक ही पक्ष के साथ हैं मगर उनके साथ होने की वजह अलग-अलग है. दोनों के बीच किसी तरह की दोस्ती नहीं हुई है और यह केवल अलग रुचियां और अलग धारणाएं हैं जो यहां पर काम कर रही हैं. लेकिन भारत और दूसरे विकासशील देशों ने जो रुख अपनाया है उन पर बारीकी से नज़र डालने पर एक कठोर तथ्य सामने आ रहा है जो धारणा की समानता है.

भारत हर मामले में अमेरिकी लाइन पर चलना नहीं चाहता

भारतीय नेताओं और नीति निर्धारकों ने इस बात पर जोर दिया है कि यूक्रेन संकट पर दिल्ली का रुख गुटनिरपेक्षता की वापसी नहीं कहा जा सकता. भारत अपने हित के मुताबिक अलग-अलग शक्तियों या समूहों के साथ अलग तरह के गठबंधन कर सकता है. विदेश मंत्री एस जयशंकर ने जो शब्द गढ़ा है- रणनीतिक स्वायत्तता, वह वस्तुतः वही बात है. भारत की विदेश नीति बनाने वालों के दिमाग में सामरिक स्वायत्ता की अवधारणा अमेरिका-चीन व्यापार युद्ध को देख कर ही आई होगी जिसने अब काफी गंभीर आयाम अख्तियार कर लिया है.

भारत का रुख बहुत स्पष्ट है कि चीन की विस्तारवादी और आधिपत्यवादी नीतियां उसके लिए खतरा हैं. वह एयूकेयूएस जैसे सैन्य ब्लॉक का हिस्सा भी नहीं बनना चाहेगा और यह सुनिश्चित किया है कि क्वाड एक सैन्य गठबंधन की जगह अनौपचारिक रणनीतिक मंच भर बना रहे. भारत, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया की तरह चीन के साथ व्यापार युद्ध में नहीं पड़ना चाहता था और उत्तर में तनाव के बावजूद चीन के साथ अपने व्यापारिक संबंध जारी रख रहा है. भारत हर मामले में अमेरिकी लाइन पर चलना नहीं चाहता. वह जानता है कि दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्ति को अगर अविश्वसनीय नहीं तो सनकी जरूर कहा जा सकता है.

जिस तरह से ट्रम्प ने चीन के साथ रिश्तों को जारी रखा, जिस तरह से उन्होंने पर्यावरण और ईरान परमाणु समझौते पर विभिन्न वैश्विक समझौतों को विफल कर दिया, हो सकता है कि भारतीय विदेश मंत्रालय को विश्वास हो गया हो कि अमेरिकी नीति निर्माताओं पर भरोसा करना बुद्धिमानी नहीं है. कोरोना महामारी, वैक्सीन को लेकर ट्रंप का राष्ट्रवाद, दुनिया की फार्मेसी के रूप में भारत की अनूठी स्थिति और जिस तरह से दुनिया भर के देशों ने उनकी मदद के लिए भारत की ओर देखा, उससे दिल्ली के नेतृत्व को यकीन हो गया कि भारत की एक विशेष भूमिका है. एक ऐसी भूमिका जो उसे अक्सर शक्तिशाली देशों के हितों के विरुद्ध भी स्टैंड लेने को बाध्य करती है.

संयुक्त राष्ट्र या संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत अलग-थलग नहीं पड़ा

महामारी ने चीन को एक बुरे देश के रूप में पेश किया जबकी भारत को दूसरे देशों ने कृतज्ञता से देखा क्योंकि उसके वैक्सीन के कारण उन देशों को लाभ पहुंचा. शायद यही कारण था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, जो महामारी के आने तक गुटनिरपेक्ष सम्मेलन में दिलचस्पी नहीं रखते थे, 2016 और 2019 के शिखर सम्मेलन की अनदेखी के बाद मई 2020 में एक ऑनलाइन गुट निरपेक्ष सम्मेलन में हिस्सा लिया. प्रधानमंत्री के लिए यह महसूस करना काफी महत्वपूर्ण रहा होगा कि विकासशील देश नेतृत्व के लिए भारत की ओर किस नजरिए से देखते हैं.

अमेरिका का अचानक अफगानिस्तान से निकल कर वहां के लोकतांत्रिक और उदारवादी ताकतों को जोखिम में छोड़ना भारत के लिए एक बड़े झटके जैसा रहा. अफगानिस्तान में तालिबान की वापसी से ठीक पहले के वर्षों में भारत असहज हो रहा था क्योंकि उसने दोहा वार्ता और चार देशों की वार्ता में तालिबान और उसको सहायता पहुंचाने वाले पाकिस्तान के प्रति अमेरिका के नर्म रुख को महसूस कर लिया था. उन वार्ताओं में भारत की भागीदारी पर जोर देने से अमेरिका के इनकार से दिल्ली का मोहभंग हो गया होगा.

यूक्रेन में जनवरी तक हो रहे घटनाक्रम को लेकर पश्चिम देशों का उदासीन रुख और पहल की कमी को लेकर भारत चिंतित था. मैक्रों की पहल को पश्चिम देशों का समर्थन नहीं मिला जिससे कोई समाधान नहीं निकाला जा सका, मगर यूक्रेन को हथियार की सप्लाई पर जरूर जोर दिया गया. संयुक्त राष्ट्र या संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत अलग-थलग नहीं पड़ा. कई विकासशील राष्ट्र, छोटे और पश्चिमी देशों के सताए देशों ने भारत के साथ वोटिंग में हिस्सा नहीं लिया.

एक महाशक्ति के रूप में उभरने के लिए भारत को इनकी जरूरत है

इनमें से कई देश भारत के आत्मविश्वास से भरे तेवर को ईर्ष्या और प्रशंसा दोनों की दृष्टि से देखते रहे हैं. दुनिया भर में आम राय बन गई थी कि भारत ने खुद को हमेशा के लिए अमेरिका के साथ जोड़ लिया है. मगर यह छवि अब बदलती नजर आ रही है. नवंबर में इंडोनेशिया में जी-20 शिखर सम्मेलन की तैयारी के लिए बैठक में भारत, इंडोनेशिया और दक्षिण अफ्रीका के नेतृत्व के साथ एक नए समूह का उदय हो सकता है. वियतनाम, फिलीपींस और यहां तक ​​कि थाईलैंड जैसे आसियान देश भी इसमें शामिल हो सकते हैं.

2023 के अंत में युगांडा में अगला गुटनिरपेक्ष शिखर सम्मेलन पहला ऐसा कार्यक्रम हो सकता है जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व्यक्तिगत रूप से उपस्थित हों. कंपाला शिखर सम्मेलन में बांडुंग की बैठक को दोहराने जैसा नहीं होगा, मगर यह निश्चित रूप से हाल के दिनों में हुए सम्मेलनों से ज्यादा सार्थक होगा. देश के भीतर, यूक्रेन पर भारत की तटस्थता की आलोचना हुई है.

कई लोगों ने चेतावनी दी है कि यह पश्चिम, मुख्य रूप से अमेरिका, के साथ दोस्ती को खतरे में डाल देगा जिससे अमेरिकी प्रौद्योगिकी, रक्षा उपकरणों और बाजारों तक भारत की पहुंच खतरे में पड़ सकती है. एक महाशक्ति के रूप में उभरने के लिए भारत को इनकी जरूरत है. हालांकि इस तरह का डर निरर्थक है. यदि भारत विकासशील देशों के एक समूह का नेतृत्व करता है तो उसे लुभाने और पुरस्कृत करने की संभावना बढ़ जाएगी, जो कि इसके उलट वाली स्थिति में मुमकिन नहीं है.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, आर्टिकल में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं.)

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