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मुसलमान शादी, तलाक और उत्तराधिकार के मामलों में शरीयत अदालतों की बजाए फैमिली कोर्ट का रुख़ क्यों करते हैं?

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उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड की बीजेपी सरकारें समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code) लागू करने की योजना बना रही है, जिसके बाद 2024 लोकसभा चुनावों (2024 Lok Sabha Elections) तक यह एक प्रमुख मुद्दा बना रहेगा. यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू हो जाने के बाद शादी, तलाक, उत्तराधिकार, बच्चों को गोद लेने की प्रक्रिया और अन्य संबंधित मामले सभी धार्मिक समुदायों को प्रभावित करेंगे, लेकिन राजनीतिक कारणों से इसे इस तरह प्रचारित किया जा रहा है जैसे कि यह केवल मुस्लिम समुदाय को प्रभावित करने वाला हो. मुस्लिम समुदाय को यूनिफॉर्म सिविल कोड ख़िलाफ़ देखा जाता है क्योंकि यह समुदाय के नागरिक मुद्दों को नियंत्रित करने वाले शरीयत कानूनों (Shariat Law) में हस्तक्षेप करेगा.

शायद इसी कारण से, बीजेपी ने इसे उत्तराखंड में पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर लागू करने की योजना बनाई है, जहां मुस्लिम आबादी अधिक नहीं है, लेकिन अपने रीति-रिवाजों के साथ आदिवासियों की बड़ी संख्या है. जब व्यक्तिगत मामलों की बात आती है तो वे अपने स्वयं के कानूनों का सख़्ती से पालन करते हैं. यह जानते हुए बीजेपी इस मुद्दे पर विभिन्न जनजातीय समुदायों (Tribal Community) की प्रतिक्रिया जानना चाहती है.

इस मुद्दे पर लीगल एक्सपर्ट्स की राय

बीजेपी के लिए यूनिफॉर्म सिविल कोड का मुद्दा नया नहीं है. पार्टी ने सबसे पहले अपने 2019 के लोकसभा चुनाव घोषणापत्र में इसे लागू करने का वादा किया था. लीगल एक्सपर्ट्स के मुताबिक, केंद्र सरकार और राज्यों दोनों को यूसीसी (UCC) लागू करने का अधिकार है क्योंकि इसके तहत मुद्दे संविधान की समवर्ती सूची (Concurrent list of the Constitution) में हैं. भारतीय संविधान (Indian Constitution) के भाग 4, अनुच्छेद 44 या संविधान के निर्देशक सिद्धांतों (Directive Principles of the Constitution of India) में समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code) का उल्लेख किया गया है. इसके अनुसार ‘राज्य भारत के पूरे क्षेत्र में नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता को सुरक्षित करने का प्रयास करेगा’.

कॉमन सिविल कोड संविधान के खिलाफ?

हालांकि ऑल-इंडिया मुस्लिम पर्सनल बोर्ड (AIMPLB) का कहना है कि यूसीसी (UCC) भारत जैसे विशाल बहु-धार्मिक देश के लिए न तो उपयुक्त है और न ही उपयोगी. बोर्ड ने यह भी दावा किया है कि यूसीसी भारत के संविधान द्वारा गारंटीकृत धर्म का पालन करने के मौलिक अधिकार के खिलाफ है. बोर्ड ने नवंबर 2021 में अपने प्रस्ताव में कहा, ‘भारत विविध धार्मिक आस्था वाला देश है, और संविधान प्रत्येक नागरिक को अपनी धार्मिक आस्था मानने और उसका पालन करने और प्रचार करने की गारंटी देता है. इस तरह बोर्ड ने कहा कि ‘सरकार को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से, आंशिक रूप से या पूरी तरह से यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू करने का प्रयास नहीं करना चाहिए क्योंकि यह पूरी तरह से अस्वीकार्य होगा’. एआईएमपीएलबी (AIMPLB) ने तीन तलाक कानून का विरोध करते हुए कहा था कि यह मुस्लिम पर्सनल लॉ शरीयत एप्लीकेशन एक्ट 1936 के तहत सुरक्षित है.

मुस्लिम पर्सनल लॉ: रियलिटी चेक

मुस्लिम पर्सनल लॉ पवित्र कुरान और हदीस (पैगंबर मोहम्मद की परंपरा) पर आधारित हैं. भारत में इसका कोडिफ़ीकेशन शरीयत एप्लीकेशन एक्ट 1936 के तहत किया गया था, और तब से व्यक्तिगत मामलों में मुस्लिम समुदाय पर यह कानून लागू होता रहा. इस समुदाय के लिए विवाह, तलाक, विरासत, बच्चों को गोद लेने, गार्डियनशिप और दहेज से जुड़े मामलों को सुलझाने के लिए दारुल कज़ा (शरीयत अदालतें) बनाई गई थीं.

इसके बावजूद, चूंकि दारुल कज़ा (Darul Qaza) को कोई कानूनी स्वीकृति नहीं है, इसलिए इन धार्मिक अदालतों द्वारा तय किए गए कई मामले अक्सर फैमिली कोर्ट में आते हैं. सालों से यही हाल है. नतीजतन, मुस्लिम समुदाय इन शरीयत अदालतों से दूर हो गया है और शादी, तलाक, विरासत, गोद लेने, गार्डियनशिप आदि से संबंधित अधिकतर मुकदमों का फैसला अन्य समुदायों पर भी लागू नागरिक कानूनों के अनुसार परिवार अदालतों द्वारा किया जाता है. चूंकि शरीयत अदालतों द्वारा दिए गए निर्णयों की दीवानी (राजस्व) या आपराधिक मामलों में कानूनी वैधता नहीं है, इसलिए वे अपना महत्व खो रहे हैं.

इसलिए भले ही एआईएमपीएलबी (AIMPLB) यूनिफॉर्म सिविल कोड का विरोध करते हुए मुस्लिम पर्सनल लॉ के लिए अभियान चला रहा हो और अन्य भारतीय समुदायों की तरह मुस्लिम समुदाय, नागरिक प्रक्रिया संहिता (Civil Procedure Code), भारतीय दंड संहिता (Indian Penal Code), आपराधिक प्रक्रिया संहिता (Criminal Procedure Code), ट्रांसफर ऑफ़ प्रॉपर्टी एक्ट (Transfer of Property Act) स्पेशल मैरिज एक्ट (Special Marriage Act), फैमिली कोर्ट एक्ट (Family Courts Act), भूमि अधिग्रहण में उचित मुआवजे और पारदर्शिता का अधिकार (Right to Fair Compensation and Transparency in Land Acquisition), रिहैबिलिटेशन और रीसेटलमेंट एक्ट (Rehabilitation and Resettlement Act), दहेज निषेध अधिनियम (Dowry Prohibition Act), अभिभावक और वार्ड अधिनियम (Guardians and Wards Act), भारतीय तलाक अधिनियम 1869 (Indian Divorce Act 1869), भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम (Indian Succession Act) जैसे अन्य कानूनों पर भरोसा कर रहे हैं.

साथ ही हनफ़ी, मलिकी, शफ़ई और हनबली (सभी सुन्नी संप्रदाय) और जाफ़री (शिया संप्रदाय) जैसे विभिन्न इस्लामिक जुरिस्प्रूडेन्स (Islamic jurisprudences) द्वारा कोडिफाइड नियम किसी व्यक्ति के पर्सनल लाइफ से संबंधित हैं. हक़ीक़त यह है कि पर्सनल लॉ, इस्लाम की मूल भावना का निर्माण करने वाले उसके पांच स्तंभों – आस्था (faith), इबादत (prayer), ख़ैरात (alms), रोज़ा (fasting) और हज़ यात्रा (pilgrimage) – का हिस्सा नहीं है.

आगे का रास्ता क्या है?

उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश में राज्य सरकारों द्वारा यूनिफॉर्म सिविल कोड को कानून की शक्ल दिया जाना बाकी है. लेकिन कब और अगर इसे लागू किया जाता है, तो क्या यह मुसलमानों की मूल भावना को प्रभावित करेगा? यह बहस का विषय बना हुआ है, सच्चाई यह है कि फैमिली कोर्ट एक्ट पहले से ही मुस्लिम समुदाय पर लागू है. हालांकि, इस समुदाय में मौजूद डर को दूर करने के लिए इस संबंध में पक्ष और विपक्ष के सभी मुद्दों पर उचित बहस करने की आवश्यकता है क्योंकि मुस्लिम समुदाय में आशंका है कि यूसीसी उनकी आस्था पर प्रतिकूल प्रभाव डालेगा.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, आर्टिकल में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं.)

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