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मठाधीशों के आगे बौने पड़े पीके! आखिर बदलावों से क्यों डरती है देश की सबसे पुरानी पार्टी?

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जैसे ही फ़्लो बना कइयों का ग्लो देखकर वो चलते बने. देश की सबसे पुरानी पार्टी के लिए कई चीजें कढ़ी गईं. गढ़ी गईं पर अंदर फैला रायता देखकर उसे समेटने से अच्छा उन्होंने उससे बाहर रहने का ही रास्ता पकड़ा. कोई एक बहका हो तो उसे रास्ते में लाया जाए, पर यहां तो सभी अपनी-अपनी डफली अपना-अपना राग अलापने में लगे हैं.

बड़े काम करने का एक ही तरीका है कि आप वही काम करिए, जो आपको सबसे ज्यादा पसंद हो. स्टीव जॉब्स कहते हैं ऐसा, पर यहां अपनी पसंद से ज़्यादा दूसरों की पसंद मायने रखती है. और यह भी ध्यान रखना होता है कि आपकी पसंद से किसी को पसंघा ना लग जाए. या बट्टा. कई सपनों को साकार करने के लिए चीजें आकार ले ही रहीं थीं कि सांचा टूट गया. कई दिनों की जद्दोजहद के बाद जून तक जॉइनिंग की उड़ने वाली अफ़वाहें अब अनॉइंग मोड में आ गईं हैं. दाख़िले की बात हो ही रही थी कि स्कूल के प्रबंधक, प्रधानाचार्य और माननीय सदस्यों के रुख़ देखकर उन्होंने बाउंड्रीवाल के बाहर रहने में ही अपनी भलाई समझी.

मुझसे ज़्यादा हाथ को नेतृत्व और सामूहिक इच्छा की ज़रूरत की बात बताकर मुंह मोड़ने वाले प्रशांत किशोर ने मंगलवार शाम को उन सारी अटकलों पर विराम लगा दिया, जो उन्हें पंजे से पंजा मिलाने की दावत देती नज़र आ रहीं थी. उनकी एंट्री को कई दिग्गज बकवास बताते सुने जा रहे थे तो कई मठाधीश ये कह रहे थे कि ऐसे पता नहीं कितने आए गए. अगर आ भी गए तो कोई फ़र्क़ नहीं पड़ने वाला. शायद ये सही कह रहे थे कि एक अकेला चना भला क्या भाड़ फोड़ सकता है. सलाह देते रहिए. देने में कोई बुराई भी नहीं है. जॉय ऑफ़ गिविंग का मजा लीजिए. पर बाहर से ही. क्योंकि यदि आप अंदर आए तो अभिमन्यु बना दिए जाएंगे. वो कहते हैं न समझदार को इशारा ही काफी है.

2014 के बाद से चांदी कूटने वाले चुनावी रणनीतिकार किशोर ये जानते हैं कि यहां की दुकान में हाल फ़िलहाल तो कुछ नहीं हो सकता. बाद में चाहे जो हो जाए. तभी तो उन्होंने इनकार में ये इकरार किया कि पहले इन्हें संरचनात्मक समस्याओं को ठीक करने की ज़रूरत है. बाद में कुछ और. 15 दिन में कई बैठकें हुईं. कई कमेटी बनीं. बाक़ायदा कोरा काग़ज़ भी गोदा गया. कला और राज के साथ. कला तो दिखा दी गई पर राज आता ना देख उन्होंने मुंह मोड़ना ही बेहतर समझा. दो घंटे में प्रशांत के इनकार को 6 हज़ार लोग रिट्वीट कर चुके थे. कई उनके पक्ष में कुलबुला रहे थे तो कई विपक्ष में बिलबिला रहे थे. किसी ने कहा कि सौदा नहीं पटा तो मालिक को ही कोसने लगे तो कोई बोला ये चतुरकिशोर हैं. जानते हैं कि कांग्रेस अब जीतने वाली नहीं.

अब जितने मुंह उतनी बातें. कोई कह रहा है कि उनकी धारा तो ठीक थी पर विचार थोड़ा भटके हुए हैं. कोई कह रहा है कि वफ़ा नाम से वो कोसों दूर हैं. मतलब हमारे साथ आना है तो हमारे साथ ही रहना पड़ेगा. आपको सबका साथ, सबका विकास वाले रास्ते से बाहर आना होगा. ऐसा कैसे हो सकता है कि आप कांग्रेस में आएं, खाएं और बजाएं किसी और की. समर्पण का भाव चाहिए और सिर्फ कांग्रेस को उठाने का ताव. फ्री हैंड चाहने वाले अक्सर फ्री ही रहते हैं. सबकी सुननी और समझनी पड़ती है. छुटकों के यहां अपनी शर्तें चलती हैं. बड़कों के यहां सिर्फ उन्ही की चलती हैं.

Had a wonderful meeting with my old friend PK Old wine , Old gold and Old friends still the best !!! pic.twitter.com/OqOvkJqJmF

— Navjot Singh Sidhu (@sherryontopp) April 26, 2022

खैर अब तक तमाम विश्लेषण आप सुन चुके होंगे. और दिमाग में जो बुनना है वो चुन लिए होंगे. तीन-चार घंटे के इस इकरार के ड्रामे में सबसे शानदार एंट्री सिद्धू की हुई. जिसमें वो एक ट्वीट में यह कहते नजर आए कि पुरानी शराब, पुराना सोना और पुराने दोस्त अब भी सबसे अच्छे होते हैं. पुराने दोस्त पीके के साथ मुलाक़ात बेहतरीन रही…. बाकायदा एक रंगीन तस्वीर के साथ. पर इसमें ज्यादा जज्बाती होने की जरूरत नहीं. क्योंकि इनको जवाब @BackwardArmy के हैंडल ने यह कहकर दे दिया कि बीजेपी का फ्यूज बल्ब वायरिंग ही जला के रख दिया.

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