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पाकिस्तान की सरकार कई साल तक फैज को दुश्मन मानती रही, अब भारत भी वही कर रहा है

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सीबीएसई (CBSE) ने फैज अहमद फैज (Faiz Ahmad Faiz) की दो कविताओं के अंश हटाने का कथित फैसला लिया है. इस निर्णय से ज्यादा आश्चर्यजनक बात यह है कि ये दोनों कविताएं हकीकत में एक दशक से भी अधिक समय तक स्कूलों के पाठ्यक्रम में शामिल रहीं, जबकि करीब आठ साल से सत्ता में बीजेपी की सरकार है. 2020 के दौरान नागरिकता संशोधन कानून (Citizenship Amendment Law) के विरोध में जब देश भर में प्रदर्शन चरम पर थे, तब क्रांतिकारी कवि फैज अहमद फैज की मशहूर कविता ‘हम देखेंगे’ ने आंदोलन में जान फूंक दी थी. दरअसल, इस कविता में तमाम ऐसी बातें थीं, जिन्होंने इसे राजनीतिक संगठन बीजेपी के भगवा परिवार का दुश्मन साबित कर दिया. जैसे फैज अहमद फैज मार्क्सवादी थे. उनकी कविताएं कमजोर वर्ग की क्रांति की आवाज बनती थीं. उन्हें राष्ट्रवाद नहीं सुहाता था और वे मुस्लिम थे.

फैज के बारे में कहा जाता है कि वह पाकिस्तानी थे, लेकिन यह बात उन पर सटीक नहीं बैठती. उनका जन्म साल 1911 के दौरान भारत में हुआ था. भारत में ही उन्होंने पढ़ाई-लिखाई की और कॉलेज गए. अमृतसर में उन्होंने अपनी पहली नौकरी की. 1941 के दौरान श्रीनगर में शादी की और भारतीय सेना में शामिल होकर द्वितीय विश्व युद्ध लड़े. हालांकि, 1947 में जब वह महज 36 साल के थे, तब वह ‘पाकिस्तानी’ बन गए. हालांकि, अपनी पूरी जिंदगी के दौरान उनके मन में उन लोगों के प्रति लगाव और मुहब्बत बरकरार रहे, जो अब भारत में रहते हैं.

सीबीएसई ने फैज को पाकिस्तानी मानकर उनकी कविताओं को हटाने का फैसला किया है?

उन्होंने दोनों देशों की आम जनता को कभी अलग नहीं देखा और दुश्मन के रूप में तो निश्चित रूप से कभी नहीं देखा. विभाजन ‘सही’ था ‘गलत’, इस बारे में होने वाली गैरजरूरी बहस में वह कभी शामिल नहीं हुए. और उन्होंने कभी ‘हम उनके खिलाफ’ की बात को भी स्वीकार नहीं किया. वह उतने ही पाकिस्तानी थे, जितने नोबेल पुरस्कार विजेता रवींद्रनाथ टैगोर भारतीय थे. दोनों अपने-अपने देश से बेपनाह मुहब्बत करते थे, लेकिन कवि के रूप में उनका विद्रोह अपनी भौगोलिक सीमा तक ही सीमित रहा. दोनों ही कवि वास्तव में अंतर्राष्ट्रीयतावादी थे और उनके विशाल रचनात्मक कार्य देश की सीमाओं को पार करके दूर-दूर तक पहुंच गए.

ऐसे में अगर सीबीएसई ने फैज को पाकिस्तानी मानकर उनकी कविताओं को संपादित किया तो बोर्ड ज्यादा गलत नहीं हो सकता. दरअसल, इस अदम्य क्रांतिकारी ने पाकिस्तान में आजाद रहने से ज्यादा वक्त जेल में बिताया. उनकी जिंदगी का काफी बड़ा हिस्सा निर्वासित के रूप में गुजरा. सिलेबस से कविताओं को हटाने के मामले में फैज को एक और क्रांतिकारी साहित्यकार महाश्वेता देवी का साथ मिला. दरअसल, दिल्ली विश्वविद्यालय ने पिछले साल महाश्वेता देवी की लघु कहानी द्रौपदी को अपने पाठ्यक्रम से हटा दिया था. यह कहानी पहली बार 1977 के दौरान वामपंथी साहित्यिक पत्रिका पोरिचा में प्रकाशित हुई थी और 1978 के दौरान उनके लघु कहानी संग्रह अग्निगर्भ में शामिल की गई थी.

फैज का नाम उन मार्क्सवादी इतिहासकारों की लंबी सूची में दर्ज हो गया है, जिनकी किताबें स्कूल और कॉलेज के पाठ्यक्रम से बेहद व्यवस्थित तरीके से प्रतिबंधित की गईं. इनमें डीडी कोसंबी, आरएस शर्मा, डीएन झा, रोमिला थापर, इरफान हबीब, सतीश चंद्र, बिपन चंद्रा और सुमित सरकार शामिल हैं.

स्कूल की किताबों से फैज की कविताओं को हटा दिया

हालांकि, वे कभी भी कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य नहीं रहे. दरअसल, फैज मूलरूप से अपनी मातृभूमि से जुड़े रहे. ताशकंद में होने वाले पहले एफ्रो-एशियाई सम्मेलन में शामिल होने के लिए वह 1958 में पहली बार सोवियत संघ गए थे. इसके बाद 1962 में वह दूसरी बार सोवियत संघ गए, उस वक्त उन्हें लेनिन शांति पुरस्कार दिया गया. तब तक उनका संकलन ‘दस्त-ए-सबा’ रूस में दस्तक दे चुका था और फैज को साहित्यिक सुपरस्टार का दर्जा मिल गया था.

पाकिस्तान टाइम्स अखबार की शुरुआत होने से लेकर 9 मार्च 1951 तक फैज इस अखबार के एडिटर-इन-चीफ थे. दरअसल, 9 मार्च 1951 ही वह तारीख है, जब राज्य की पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया और उन्हें रावलपिंडी षड्यंत्र मामले में आरोपी बनाया. उनके साथ 14 अन्य लोगों पर पाकिस्तान सरकार के खिलाफ देशद्रोह और साजिश रचने के आरोप में मुकदमा चलाया गया, जिसमें दोष साबित होने पर मौत की सजा मिलनी तय थी.

इस तरह फैज की जिंदगी के कुछ बेहद स्याह वर्षों की शुरुआत हुई, लेकिन यही साल उनकी कविताओं के लिए सर्वश्रेष्ठ साबित हुए. जेल में बिताए अपने चार साल फैज ने कुछ इस तरह बयां किए. उन्होंने कहा, ‘यह एकदम वैसा ही एहसास था, जैसा नए-नए जवां हुए शख्स को होता है. यह बिल्कुल वैसा ही एहसास है, जो भोर में निकलते सूरज को देखकर होता है. शाम को ढलते सूरज से महसूस होता है… और नीले-नीले आसमान और महकती हवा से महसूस होता है.’ चार साल बाद फैज को जेल से रिहा किया गया. यही चार साल काव्य समृद्ध साबित हुए. जब वे वापस आए तो उन्हें पाकिस्तान टाइम्स में उनकी पुरानी नौकरी की पेशकश की गई, लेकिन उस वक्त अखबार पाकिस्तानी सरकार का हक कायम चुका था. ऐसे में उन्होंने कहा, ‘उसूल बिकाऊ नहीं हैं. सरकार से कहो कि अखबारों को प्रोग्रेसिव पेपर्स लिमिटेड को वापस सौंप दें और हमें उन्हें सही तरीके से चलाने दें.’

विडंबना यह है कि मोदी सरकार ने स्कूल की किताबों से फैज की कविताओं को उसी तरह हटा दिया, जैसे इस असाधारण कवि की कविताओं को पाकिस्तान में प्रतिबंध से जूझना पड़ा. दरअसल, पाकिस्तान के तत्कालीन शासक जिया-उल-हक फैज को राष्ट्रविरोधी मानते थे. लाहौर से ताल्लुक रखने वाले मनोवैज्ञानिक अली मदीह हाशमी ने एक इंटरव्यू में कहा था, फैज ‘अंतर्राष्ट्रीयवादी’ थे. वे भारत-पाक उपमहाद्वीप के लोगों के भाई और बहन होने में विश्वास रखते थे. आलम यह है कि उनके दुश्मन भी एक जैसी वजहों के चलते उनके खिलाफ रहते हैं. बता दें कि अली मदीह हाशमी फैज के पोते हैं और उन्होंने ही फैज की अधिकृत जीवनी लिखी.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, आर्टिकल में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं.)

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