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कर्नाटक सरकार बीबीएमपी चुनावों में देरी के लिए ‘कमजोर कानून’ का फायदा उठा रही है

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Guest Author- श्रीनिवास अलाविलि- कर्नाटक विधानसभा का पिछला चुनाव 2018 में हुआ था. इन 5 सालों में हमने राज्य में तीन अलग-अलग मंत्रिमंडलों को महामारी के बीच बेहद उथल-पुथल भरे माहौल में काम करते देखा. अब यह 5 साल का कार्यकाल समाप्त होने को है और कर्नाटक में फिर से विधानसभा चुनाव होने में 1 साल से भी कम का समय है. मान लेते हैं कि सत्ताधारी दल कर्नाटक के मतदाताओं के बीच एक सर्वेक्षण कराता है और उसे सर्वेक्षण से पता चलता है कि राज्य की आबादी का एक बड़ा वर्ग इस शासनकाल से खुश नहीं है. इन सबके बीच क्या होगा अगर उनके चुनावी रणनीतिकार उन्हें बिना किसी लाग लपेट के यह कह दें कि इस बार सत्ता में आना लगभग असंभव है?

क्या हालात अनुकूल होने तक सीएम बोम्मई चुनाव टाल सकते हैं?

साल 2024 में नरेंद्र मोदी बतौर प्रधानमंत्री अपना दूसरा कार्यकाल भी पूरा कर चुके होंगे, और तीसरे कार्यकाल के लिए फिर से मतदाताओं के बीच में होंगे. क्या होगा अगर बीजेपी चुनाव से पहले एक व्यापक सर्वेक्षण कराए, जिसमें उसे पता चले कि वह अब अपनी यथास्थिति को बनाए रखने में सक्षम नहीं हो सकती है?

क्या पीएम मोदी चुनावों को तब तक टाल सकते हैं, जब तक कि सर्वेक्षण यह ना दिखा दे कि वह जीत रहे हैं?

इन दोनों सवालों का एक स्पष्ट जवाब है ‘नहीं’

चुनाव लोकतंत्र के लिए जरूरी है और हमारा संविधान प्राकृतिक आपदाओं या फिर देश में बुरी तरह से बिगड़ चुके कानून व्यवस्थाओं के असाधारण परिदृश्य को छोड़कर हर 5 साल में एक निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव कराने की गारंटी देता है. इस चुनाव को न तो सीएम और न ही पीएम रोक सकते हैं. तो फिर सिटी गवर्नमेंट के चुनाव बीबीएमपी समय पर क्यों नहीं हो रहे हैं? निर्वाचित परिषद के 5 साल के कार्यकाल को समाप्त हुए लगभग 1 साल 8 महीने हो चुके हैं. बीबीएमपी का पिछला चुनाव अगस्त 2015 में हुआ था, जिसका अर्थ है कि कार्यकाल 2020 में ही समाप्त हो गया है. इसके बावजूद भी हम अप्रैल 2022 तक चुनाव कराने में सक्षम नहीं हैं और फिलहाल बेंगलुरु के नगर निगम के 1.3 करोड़ नागरिकों के लिए कोई भी निर्वाचित प्रतिनिधि नहीं है.

इस देरी के लिए सबसे बड़ी वजह मेरे हिसाब से कमजोर कानून है. केंद्र और राज्य सरकारों के विपरीत संविधान में स्थानीय निकायों, शहरी और ग्रामीण चुनावों से संबंधित कानूनों में कई खामियां हैं. जबकि हमारे संविधान में 73वें और 74वें संशोधन शासन के तीसरे स्तर के लिए समय पर चुनाव कराने को अनिवार्य करते हैं. यह चुनाव केंद्रीय चुनाव आयोग द्वारा नहीं बल्कि राज्य चुनाव आयोग द्वारा आयोजित किए जाते हैं. दरअसल एसईसी यानी स्टेट इलेक्शन कमीशन, सेंट्रल इलेक्शन कमिशन की तरह स्वतंत्र और सशक्त नहीं है. राज्य के नगर पालिका कानून निर्वाचन क्षेत्रों (इस मामले में नगर पालिका वार्ड) की सीमाओं को फिर से परिभाषित करने के लिए बहुत जगह छोड़ देते हैं. रिजर्वेशन कैटेगरी (लिंग और जाति के आधार पर) निर्दिष्ट किए जाते हैं. जैसा कि हम देख रहे हैं राज्य सरकार बेंगलुरु में चुनाव में हो रही देरी के पीछे इन्हीं तर्कों का इस्तेमाल अदालत में कर रही है. यहां तक कि देश की सर्वोच्च अदालत भी इस मामले में कार्यपालिका को जवाब देह नहीं ठहरा पा रही है.

हमारे शहरों में चुनाव होने पर राज्य सरकार नियंत्रण के लिए रिजर्वेशन और रोटेशन का उपयोग करती है. दोनों ही लोकतंत्र के महत्वपूर्ण पहलू हैं. यह सुनिश्चित करना कि राजनीतिक शक्ति सभी सामाजिक समूहों के बीच साझा की जाए और एक विशिष्ट समूह या व्यक्ति द्वारा सत्ता पर हमेशा कब्जा न बना रहे, अच्छी बात है.

संसद या राज्य विधानमंडल के विपरीत भारत के 36 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों के 18 नगर परिषदों में महिलाओं के लिए 50 फ़ीसदी आरक्षण अनिवार्य है, यह आरक्षण हमारी राजनीति में लैंगिक संतुलन बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम है. आरक्षण के बिना राजनीतिक दल महिलाओं को राजनीति में पनपने ही नहीं देते. जाहिर है कि केंद्र सरकार में महिलाओं का 14 फ़ीसदी प्रतिनिधित्व और सभी राज्य सरकारों में 8 फ़ीसदी प्रतिनिधित्व है.

इसी तरह पिछड़े वर्गों को केंद्र या राज्य के विपरीत स्थानीय निकाय चुनावों में पर्याप्त प्रतिनिधित्व मिलता है. 198 सदस्यों की बीबीएमपी परिषद सही मायनों में बेंगलुरु की विविधता का प्रतिनिधित्व करती है, जैसा कि होना भी चाहिए. हालांकि दुर्भाग्य से राजनीतिक दलों द्वारा इस अच्छी सुविधा का दुरुपयोग किया जा रहा है. सत्तारूढ़ दल राजनीतिक रूप से विपक्ष को कुचलने और उनके जीतने की संभावना को कम करने के लिए आरक्षण श्रेणियों का उपयोग एक हथियार की तरह करते हैं.

बीबीएमपी एक एडमिनिस्ट्रेटर द्वारा चलाया जाता है, जो राज्य सरकार का प्रतिनिधि होता है और निर्वाचित परिषद की अनुपस्थिति में लोगों की आवाज के रूप में काम करता है. 198 निर्वाचित सदस्यों के साथ कार्यपालिका- महापौर, उपमहापौर, स्थाई समितियों और काउंसिल के बजाय सीधे एडमिनिस्ट्रेटर को रिपोर्ट करती हैं. पार्षद चुनाव जीतकर अपने वार्ड के नागरिकों का प्रतिनिधित्व करने का अधिकार जरूर अर्जित करते हैं, लेकिन उनकी अनुपस्थिति में शहर के शासन के मामलों में नागरिकों की कोई सुनवाई नहीं होती.

निर्वाचित प्रतिनिधि जनता के प्रति जवाबदेह होते हैं, अगर वह जनता के कामों को सही समय पर नहीं करेंगे तो उन्हें बाहर कर दिया जाता है. अगर किसी विशेष वार्ड में भयानक बाढ़, गड्ढों से खराब सड़कें, पानी की आपूर्ति सही समय पर ना होना और मच्छर जैसी समस्याओं का अनुभव होता है तो यह सुनिश्चित हो जाता है कि वह पार्षद अब दोबारा फिर से जनता से वोट मांगने के काबिल नहीं रह गया.

जबकि अधिकारियों की ऐसी कोई जवाबदेही नहीं है. गड्ढे, बाढ़ और मच्छर जैसी समस्याएं टीवी और सोशल मीडिया पर जरूर सुर्खियां बटोर सकती हैं और इन पर अंतहीन बहसें भी हो सकती हैं, लेकिन किसी भी अधिकारी को पद से हटाने के लिए यह मजबूर नहीं कर सकते. यानी कि वह अधिकारी जिन्होंने खराब शासन दिया आम जनता की सुख सुविधाओं का ख्याल नहीं रखा, इसके बावजूद भी वह अपना काम जारी रख सकते हैं. बीबीएमपी के चुनाव न कराने की यह मूलभूत समस्या है.

हमें बीबीएमपी अधिकारियों, आयुक्तों, इंजीनियरों, स्वास्थ्य निरीक्षकों, राजस्व अधिकारियों को जवाबदेह ठहराने के लिए पार्षदों की जरूरत है. 198 नगर सेवकों की सामूहिक आवाज नगर परिषद में नागरिकों की दैनिक समस्याओं को अभिव्यक्ति देने वाले आवाज की जरूरत है. मासिक परिषद की बैठकों के बिना नागरिकों के लिए कोई आधिकारिक मंच नहीं है. वार्ड समितियां जनता और बीबीएमपी के बीच की खाई को पाटने के मामले में कोई राहत देने के मूड में नहीं है. लेकिन एक पार्षद वार्ड समिति की अध्यक्ष हैं जो डेढ़ साल से गायब हैं.

जैसे ही मानसून आता है, हमें पता होता है कि कैसी समस्याएं आने वाली हैं. हजारों गड्ढों से सड़कें उखड़ जाती हैं, निचले इलाकों में पानी भर जाता है कुछ जगहों पर तो नावें भी दिख रही होती हैं और इस रुके हुए पानी की वजह से वायरल संक्रमण और तेजी से फैलता है. बारिश के पानी को नालों तक पहुंचाने वाले नालियों को नियमित रूप से साफ किए जाने की जरूरत होती है.

क्या बेंगलुरु में खराब शासन के लिए मुख्यमंत्री को किसी नतीजे का सामना करना पड़ेगा? बिल्कुल नहीं. क्योंकि उनकी प्राथमिकता कर्नाटक विधानसभा के 224 विधानसभा सीटों में से अधिक से अधिक सीटें जीतकर अपनी सरकार बनाने से है. इसलिए बीबीएमपी चुनाव अधर में लटका हुआ है. जब तक नागरिक अदालती फरमान के साथ-साथ राज्य सरकार पर भारी दबाव नहीं डालते, मुझे उम्मीद नहीं है कि यह चुनाव इतनी जल्दी होगा.

(लेखक जनआग्रह में सिविक पार्टिसिपेशन के हेड हैं, आर्टिकल में व्यक्त विचार उनके निजी हैं.)

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