नई दिल्ली: इंसानी ज़िंदगी में रिश्तों की अहमियत उस फसल की तरह होती है, जिसकी पैदावार पूरी तरह इस बात पर निर्भर करती है कि उसे कैसे सींचा गया है। यह सच है कि रिश्तों पर कभी गम तो कभी खुशी के मौसमों की मार पड़ती है, लेकिन असली हुनर हर हाल में उनकी हिफाज़त करना है। आज के इस दौर में, जब हम रिश्तों और अपनी जड़ों को टटोलते हैं, तो एक तरफ उर्दू शायरी की पुरानी रवायत हमें रिश्तों का सलीका सिखाती है, तो दूसरी तरफ आधुनिक अमेरिकी कविता एक प्रवासी के अस्तित्व के डर को बयां करती है।
उर्दू शायरी के आईने में रिश्तों की हकीकत
उर्दू के मशहूर शायरों ने रिश्तों के हर रंग—खटास, मिठास और मजबूरी—को अपनी कलम से बहुत खूबसूरती से उकेरा है। रिश्तों में आई दरारों के बावजूद इंसानियत को जिंदा रखने की नसीहत देते हुए निदा फ़ाज़ली लिखते हैं:
दुश्मनी लाख सही ख़त्म न कीजे रिश्ता > दिल मिले या न मिले हाथ मिलाते रहिए
वहीं, आफ़ताब हुसैन रिश्तों में थोड़ी सी गुंजाइश बनाए रखने की वकालत करते हुए कहते हैं:
चलो कहीं पे तअल्लुक़ की कोई शक्ल तो हो > किसी के दिल में किसी की कमी ग़नीमत है
रिश्तों की नाजुकता का जिक्र करते हुए मुस्तफ़ा ज़ैदी आगाह करते हैं कि दिल के रिश्ते इतने संवेदनशील होते हैं कि वे “साँस लेने से टूट जाते हैं।” नुशूर वाहिदी भी इसी दर्द को बयां करते हैं कि मोहब्बत का एक रिश्ता टूटने से ज़िंदगी का पूरा ‘शीराजा’ (व्यवस्था) बिखर जाता है।
लेकिन समाज में कुछ रिश्ते महज दिखावे के होते हैं, जिन्हें निभाना सबसे मुश्किल होता है। इस कड़वे सच पर वसीम बरेलवी का यह शेर बेहद सटीक बैठता है:
ऐसे रिश्ते का भरम रखना कोई खेल नहीं > तेरा होना भी नहीं और तेरा कहलाना भी
रिश्तों में धोखे और साज़िशों का ज़िक्र करते हुए शकील जमाली कहते हैं कि “हर साज़िश के पीछे अपने निकलेंगे,” जो रिश्तों के दलदल की भयावहता को दर्शाता है। वहीं, जौन एलिया अपने बेबाक अंदाज़ में नए रिश्ते बनाने पर सवाल उठाते हुए कहते हैं:
नया इक रिश्ता पैदा क्यूँ करें हम > बिछड़ना है तो झगड़ा क्यूँ करें हम
इन तमाम उलझनों के बीच, राहत इंदौरी आज के शहरी जीवन के अकेलेपन और रातों की बेचैनी को रेखांकित करते हैं, जहाँ “नींदें कमरों में जागी हैं और ख़्वाब छतों पर बिखरे हैं।” लेकिन अंत में, खलील रामपुरी अपनी जड़ों से जुड़ाव का अहसास दिलाते हुए लिखते हैं:
मैं सितारा नहीं हूँ सूरज हूँ > गहरा रिश्ता है मेरा मिट्टी से
समकालीन संकट: केरेम दुर्दग की कविता ‘ध्वज’ (Flag)
जहाँ एक तरफ उर्दू शायरी ‘मिट्टी’ से गहरे रिश्ते की बात करती है, वहीं सात समुंदर पार अमेरिका के मेन (Maine) राज्य में एक अलग तरह की जद्दोजहद चल रही है। तुर्की मूल के अमेरिकी कवि और फिल्म निर्माता केरेम दुर्दग ने अपनी ताज़ा कविता ‘फ्लैग’ (ध्वज) में एक प्रवासी (immigrant) के डर और साहस को शब्द दिए हैं। यह कविता ‘इमिग्रेशन एंड कस्टम्स एनफोर्समेंट’ (ICE) द्वारा प्रवासियों के बीच पैदा किए गए खौफ के जवाब में लिखी गई है।
केरेम की यह कविता महज शब्द नहीं, बल्कि एक सवाल है कि क्या नफरत के इस दौर में भी मानवता का संगीत बजता रहेगा?
यहाँ उनकी कविता का हिंदी भावानुवाद प्रस्तुत है:
ध्वज
मैंने उन्हें देखा > ICE नाम का वह शिकंजा > जो मेरे गले के नीचे तक उतर आया है > कस्टम (रिवाजों) को जबरन लागू करते हुए > यहाँ और वहाँ…
क्या वे मेरे लिए आएंगे? > और जब वे आएंगे, तो क्या संगीत बजता रहेगा? > मेरी पत्नी को कैसे पता चलेगा?
मेरी कोशिकाएं धड़क रही हैं > नफरत के आघात से, > जबकि शराफ़त की एक रोशनी > चमकदार शोर-शराबे के किनारों पर > लड़ाई लड़ रही है। > जब यह सब होगा, क्या तब संगीत बजता रहेगा?
तुम्हें पता है, > मैं पैदा होने के मिली-सेकंड बाद ही > एक ‘अप्रवासी’ बन गया था, > यह सच है… > क्या मेरे आने पर संगीत बजा था?
मैं उस झंडे को > संघर्ष के मैदान में ले जाना चाहता हूँ, > क्या तब मेरे लिए संगीत बजेगा?
— केरेम दुर्दग
मेगन ग्रंबलिंग, जो ‘डीप वाटर’ सीरीज का संपादन करती हैं, मानती हैं कि केरेम की यह कविता अराजकता और खतरे के बीच सच बोलने का एक साहसिक प्रयास है। यह कविता और ऊपर दिए गए शेर हमें यह सोचने पर मजबूर करते हैं कि चाहे रिश्ता इंसान से हो या ज़मीन से, उसे बचाने के लिए एक निरंतर संघर्ष की ज़रुरत होती है।



