भारत में नई ईवी सब्सिडी से ऑटो सेक्टर में बंपर उछाल, उधर यूरोप में बदल रहे नियम

ग्लोबल लेवल पर इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) का बाजार तेजी से नई शक्ल ले रहा है। एक तरफ जहां भारत सरकार की नई नीतियों ने शेयर बाजार में ईवी कंपनियों के शेयरों को पंख लगा दिए हैं, वहीं यूरोप में सख्त एमिशन नियमों के चलते इलेक्ट्रिक कारों की कीमतों में भारी गिरावट देखी जा रही है। सरकारी नीतियों का असर किस तरह अलग-अलग बाजारों पर पड़ रहा है, यह हालिया घटनाक्रमों से साफ जाहिर होता है।

नई सब्सिडी स्कीम और शेयरों की उड़ान

भारत सरकार ने दुनिया के तीसरे सबसे बड़े ऑटोमोटिव बाजार में इलेक्ट्रिक मोबिलिटी को रफ्तार देने के लिए 10,900 करोड़ रुपये की नई सब्सिडी योजना को मंजूरी दे दी है। दो साल तक चलने वाली इस स्कीम के तहत 14,028 इलेक्ट्रिक बसों के साथ-साथ 24.79 लाख टू-व्हीलर और 3.16 लाख थ्री-व्हीलर वाहनों को सरकारी सपोर्ट मिलेगा। हालांकि, इस योजना से इलेक्ट्रिक कारों और हाइब्रिड गाड़ियों को बाहर रखा गया है।

इस फैसले का असर शेयर बाजार पर तुरंत देखने को मिला। गुरुवार को जेबीएम ऑटो (JBM Auto) के शेयरों में 8 फीसदी की जोरदार तेजी आई और यह 2093 रुपये के इंट्रा-डे हाई पर पहुंच गया। ओलेक्ट्रा ग्रीनटेक लिमिटेड के शेयर भी पीछे नहीं रहे, इनमें 5 प्रतिशत का उछाल आया और शेयर 1,699 रुपये के स्तर तक जा पहुंचे। इसके अलावा कॉस्मो फेराइट्स (Cosmo Ferrites) में 13 फीसदी और केन्स टेक्नोलॉजी (Kaynes Technology) के शेयरों में 12 प्रतिशत की शानदार तेजी दर्ज की गई।

कंपनियों को भारी मुनाफे की उम्मीद

जेबीएम ऑटो के मैनेजिंग डायरेक्टर ने इस कदम का स्वागत करते हुए कहा कि नई स्कीम का असली फायदा कंपनी को अगले वित्त वर्ष की दूसरी छमाही में मिलना शुरू होगा। किसी भी नए प्रोजेक्ट के तहत नई बसों को सड़क पर उतारने में आमतौर पर 9 से 12 महीने का वक्त लगता है, इसलिए इसका व्यावसायिक असर आने वाले महीनों में साफ नजर आएगा।

यूरोपीय बाजार में घटते दाम और बढ़ती बिक्री

भारत में जहां कमर्शियल और टू-व्हीलर ईवी पर फोकस है, वहीं यूरोपीय यूनियन (EU) में इलेक्ट्रिक कारें अब आम लोगों के बजट में आ रही हैं। ट्रांसपोर्ट एंड एनवायरनमेंट (T&E) ग्रुप की एक रिपोर्ट के मुताबिक, यूरोप में एक औसत इलेक्ट्रिक कार की कीमत 4 फीसदी (करीब 1,800 यूरो) घटकर 42,700 यूरो पर आ गई है। इस गिरावट की मुख्य वजह बाजार में नए और सस्ते ईवी मॉडल्स की एंट्री है।

कीमतों में आई इस नरमी का सीधा असर बिक्री पर भी दिखा है। साल 2025 में यूरोपीय यूनियन और नॉर्वे में बिकने वाली कुल नई कारों में ईवी की हिस्सेदारी 19 फीसदी हो गई, जो इसके पिछले साल 14 प्रतिशत थी। T&E का स्पष्ट मानना है कि ईयू के सख्त कार्बन एमिशन मानकों की वजह से ही कार निर्माता अपनी रणनीति बदलने और सस्ते मॉडल बाजार में उतारने को मजबूर हुए हैं। ऑटो कंपनियों पर एमिशन टारगेट पूरा न करने की स्थिति में भारी जुर्माने का दबाव है।

2035 के नियमों पर खींचतान और लॉबिंग

भले ही यूरोप में ईवी की बिक्री बढ़ रही है और कंपनियां 2025-2027 के शुरुआती एमिशन टारगेट्स को पूरा कर रही हैं, लेकिन कार निर्माता भविष्य के कड़े नियमों से घबराए हुए हैं। 2035 तक पेट्रोल और डीजल कारों की बिक्री पर पूरी तरह से रोक लगाने वाले फैसले को यूरोपीय कार कंपनियों ने अव्यावहारिक बताया है। इस भारी विरोध के बाद अब ईयू के पर्यावरण मंत्री अगले हफ्ते इस बैन में थोड़ी ढील देने के प्रस्ताव पर चर्चा करने वाले हैं।

दिसंबर में सामने आए नए प्लान के मुताबिक, अब कार निर्माताओं को 2035 तक एमिशन को 2021 के स्तर से 100 प्रतिशत के बजाय 90 फीसदी तक ही कम करना होगा। इसके अलावा, ईयू में बनने वाली छोटी और किफायती इलेक्ट्रिक कारों के लिए कंपनियों को ‘सुपर क्रेडिट’ का फायदा भी मिलेगा। यह एक तरह की अकाउंटिंग सहूलियत है जिससे उनके लिए एमिशन टारगेट पूरा करना आसान हो जाएगा।