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Home » ‘हमारे देश का नियम व व्यवस्था संविधान के आधार पर होनी चाहिए, न कि किसी व्यक्ति के अंधेरे डंडे पर…’ ऐसे विचार से संसद ने सेंगोल को हटाने का आदान-प्रदान किया है। इसके पीछे का पूरा कारण जानने के लिए पढ़ें।

‘हमारे देश का नियम व व्यवस्था संविधान के आधार पर होनी चाहिए, न कि किसी व्यक्ति के अंधेरे डंडे पर…’ ऐसे विचार से संसद ने सेंगोल को हटाने का आदान-प्रदान किया है। इसके पीछे का पूरा कारण जानने के लिए पढ़ें।

by Nikhil

18वीं लोकसभा के पहले सत्र में सत्ता और विपक्ष एक-दूसरे के खिलाफ टकरा रहे हैं। NEET परीक्षा में लीक मामले में विपक्ष सरकार को घेर रहा है। इस दौरान, 77 साल पुराने सेंगोल का मुद्दा फिर से संसद में उठा है। समाजवादी पार्टी के नेता सेंगोल को संसद से हटाने की मांग कर रहे हैं। जब राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने संसद के संयुक्त सत्र को संबोधित किया, तो समाजवादी पार्टी के सांसदों ने सेंगोल को संसद में उतारने की मांग की। उन्होंने संविधान की कॉपी रखने की भी बात की।

समाजवादी पार्टी के सांसद आरके चौधरी ने शुरुआत की है कि देश में संविधान ही सर्वोपरि होना चाहिए, तो फिर लोकसभा में राजतंत्र के प्रतीक सेंगोल को रखने की क्या जरूरत है? उन्होंने उत्तर प्रदेश के मोहनलालगंज सीट से स्पीकर ओम बिरला को पत्र भी लिखा है, जिसमें वे कहते हैं कि सेंगोल शब्द तमिल भाषा का है और इसका हिंदी में मतलब ‘राजदंड’ होता है। इसे उन्होंने एक प्रकार के राजा के डंडे के समान बताया है, जो लोकतंत्र के मंदिर में जगह नहीं रखनी चाहिए, बल्कि इसे म्यूजियम में संरक्षित किया जाना चाहिए।

समाजवादी पार्टी के सांसद आरके चौधरी ने यह कहते हुए शुरुआत की है कि देश की आजादी के बाद सेंगोल का इतिहास गहरे संबंध में जुड़ा हुआ है। उन्होंने बताया कि 14 अगस्त 1947 की रात को पंडित जवाहर लाल नेहरू ने तमिलनाडु से आए विद्वानों से सेंगोल को स्वीकार किया था, जिसे वे ब्रिटिश साम्राज्य से भारतीय स्वतंत्रता के प्रतीक के रूप में स्वीकार किया था। चौधरी ने इस बात को उजागर करते हुए कहा कि अब संसद में सेंगोल को हटाने की मांग उठाई गई है, क्योंकि वे मानते हैं कि लोकतंत्र को सुरक्षित रखने के लिए संसद भवन में इसे नहीं रखना चाहिए।

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