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लोकसभा स्पीकर का पद सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच एक महत्वपूर्ण संयोग होता है, जो राष्ट्रीय नेतृत्व के लिए एक प्रतीक भी है।

by Nikhil

जब भी लोकसभा चुनावों के परिणाम सामने आते हैं, तो नई सरकार गठन की प्रक्रिया शुरू होती है। इस बार, एनडीए ने एक बार फिर से बहुमत हासिल किया है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नयी राजनीतिक टीम को तैयार किया है। विपक्षी दल भी सक्रिय रूप से चुनौती दे रहे हैं। लोकसभा का नया सत्र 24 जून से शुरू हो रहा है, जिसमें सदन के संचालन के लिए नए स्पीकर का चुनाव होगा।

स्वतंत्रता के बाद भारतीय राजनीति में इस बार पहली बार हो रहा है कि लोकसभा के स्पीकर पद के लिए सत्ताधारी पक्ष और विपक्ष दोनों अपने उम्मीदवारों को उतार रहे हैं। अगले कल, यानी 26 जून को सुबह 11 बजे, स्पीकर के चुनाव का महत्वपूर्ण चरण होगा। इससे स्पष्ट होगा कि लोकसभा का नया स्पीकर कौन होगा।

स्पीकर और डिप्टी स्पीकर का चुनाव लोकसभा में सदस्यों द्वारा होता है, जिसमें उम्मीदवारों के प्रस्तावों को लोकसभा सचिवालय में जमा किया जाता है। यह प्रक्रिया ‘नोटिस ऑफ मोशन’ के नाम से जानी जाती है। इस पद के लिए चुनाव की तारीख राष्ट्रपति द्वारा निर्धारित की जाती है, जिसके बाद सदन में मतदान कराया जाता है।

लोकसभा के स्पीकर का पद भारतीय राजनीति में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है। यह पद सत्ताधारी पार्टी या गठबंधन की ताकत का प्रतीक माना जाता है और इसका संबंध लोकसभा के कामकाज की पूरी निगरानी के साथ होता है। विशेष अधिकारों के माध्यम से स्पीकर को संसद के विभिन्न मामलों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने का अवसर मिलता है, जैसे कि संविधान के अनुच्छेद 108 के तहत संसद की संयुक्त बैठक की अध्यक्षता और विपक्षी नेताओं को मान्यता देना।

1999 में एक ऐतिहासिक संदर्भ में, लोकसभा के स्पीकर ने अपने विशेष अधिकारों का इस्तेमाल कर एक महत्वपूर्ण वोटिंग के माध्यम से अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार को गिराने में मदद की थी। इससे स्पीकर पद की महत्वपूर्ण भूमिका और उसके अधिकारों का महत्व स्पष्ट होता है।

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