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तीन पुत्र, जिन्होंने पिता की छाया से बाहर निकलकर अपनी पहचान बनाई, अब खेलकूद के मामले में उन्नति कर रहे हैं।

by Nikhil

अखिलेश यादव, तेजस्वी यादव और चिराग पासवान, ये तीनों विपक्षी नेता हैं, जिन्होंने अपने पिता के बड़े नाम के साये से बाहर निकलकर अपनी पहचान बनाई है। लोकसभा चुनाव 2024 में उन्होंने अपनी राजनीतिक दक्षता को प्रदर्शित किया है और उनके नेतृत्व में उनकी पार्टियों ने महत्वपूर्ण सीटों पर बड़ी जीत दर्ज की है। इससे पता चलता है कि यह तीनों नेता अपने पिता की छाया से बाहर निकलकर स्वयं के पैरों पर खड़े हो चुके हैं।

उत्तर प्रदेश के भूखंड में नई राजनीति की धूम मची है। 2017 के विधानसभा चुनाव में हुई हार के बावजूद, अखिलेश यादव ने अपनी राजनीतिक कौशल से दिखाया है कि जीत और हार केवल एक मोर्चा हैं, जीत उसके मनोबल को हारा नहीं सकती। अपने चाचा शिवपाल की बगावत के बाद, उन्होंने न केवल उन्हें फिर से संगठित किया, बल्कि उनके बारे में लोगों के विश्वास को भी पुनः जीता।

यादव परिवार की राजनीतिक विरासत में अखिलेश यादव का संघर्ष एक प्रेरणास्त्रोत बन गया है। उन्होंने अपने परिवार के विरोधियों के बावजूद न केवल पार्टी को पुनः एकत्रित किया, बल्कि अपने नेतृत्व में जनमानस को भी विश्वास दिलाया।

इसी तरह, बिहार में भी नए रंग की राजनीति की शुरुआत हुई है। तेजस्वी यादव का उत्कृष्ट प्रदर्शन न केवल बिहार में, बल्कि पूरे देश में भी बड़ा ध्यान खींचा है। उन्होंने अपनी अद्वितीय मेहनत और प्रतिबद्धता से दिखाया है कि राजनीतिक मैदान में जीत वही है, जो निरंतर प्रयास करता है। इस प्रकार, वे भ्रष्टाचार के मामले में जजमानत पर बाहर होने के बावजूद, लालू यादव की अभाविता को पूरा करते हुए बिहार की राजनीति में अग्रणी भूमिका निभा रहे हैं।

इस चुनाव में आरजेडी ने 4, कांग्रेस ने 3 और सीपीआईएमएल ने 2 सीजों पर जीत हासिल की हैं। जबकि साल 2019 के चुनाव में आरजेडी शून्य पर सिमट गई थी, जबकि एनडीए ने 40 में से 39 सीटें जीती थीं। इस तरह से तेजस्वी की मेहनत को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है।

बिहार के एक और नेता और रामविलास पासवान के बेटे चिराग पासवान को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। इस चुनाव में वह भी काफी मैच्योर नजर आए। वह एनडीए का हिस्सा हैं। चिराग ने लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) को उन सभी पांच सीटों पर जीत दिलाई, जिन पर उन्होंने उम्मीदवार उतारे थे। चुराग पासवान ने अपने दिग्गज नेता पिता के मार्गदर्शन से अपनी राजनीतिक यात्रा शुरू की थी। लेकिन 2020 में राजविलास पासवान के निधन के बाद से उनकी पारिवारिक कलह शुरू हो गई। चिराग के चाचा पशुपति कुमार पारस ने उनकी राजनीतिक विरासत पर दावा कर पार्टी उनसे ले ली। जिसके बाद शुरू हुई चिराग पासवान की अपनी राजनीतिक पहचान की लड़ाई।

चिराग ने एक प्रयास शुरू किया जिसका उद्देश्य था बिहार के लोगों के बीच जुड़ाव बढ़ाना, जिसके लिए उन्होंने ‘बिहार फर्स्ट, बिहारी फर्स्ट’ अभियान शुरू किया। इसके साथ ही, उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय दल का समर्थन भी जारी रखा। इस प्रयास ने सफलता प्राप्त की और चुनावी परिणामों में इसका प्रभाव दिखाई दिया। बीजेपी ने चुनाव से पहले यह निर्णय लिया कि अगर वे बिहार में जीत चाहते हैं, तो चिराग पासवान उनके लिए सही दांव हैं। चुनावी परिणाम दिखाते हैं कि इनकी योजना ने कामयाबी हासिल की है। बीजेपी को बहुमत से दूरी है, ऐसे में चिराग पासवान उनके महत्वपूर्ण सहयोगी बने हैं।

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